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दो पल की जिंदगी

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देखा जब नहीं उनको और हमने गीत नहीं गाया
जमाना हमसे ये बोला की फागुन क्यों नहीं आया

फागुन गुम हुआ कैसे ,क्या तुमको कुछ चला मालूम
कहा हमने ज़माने से की हमको कुछ नहीं मालूम

पाकर के जिसे दिल में ,हुए हम खुद से बेगाने
उनका पास न आना ,ये हमसे तुम जरा पुछो

बसेरा जिनकी सूरत का हमेशा आँख में रहता
उनका न नजर आना, ये हमसे तुम जरा पूछो

जीवितं है तो जीने का मजा सब लोग ले सकते
जीवितं रहके, मरने का मजा हमसे जरा पूछो

रोशन है जहाँ सारा मुहब्बत की बदौलत ही
अँधेरा दिन में दिख जाना ,ये हमसे तुम जरा पूछो

खुदा की बंदगी करके अपनी मन्नत पूरी सब करते
इबादत में सजा पाना, ये हमसे तुम जरा पूछो

तमन्ना सबकी रहती है, की जन्नत उनको मिल जाए
जन्नत रस ना आना ये हमसे तुम जरा पूछो

सांसों के जनाजें को, तो सबने जिंदगी जाना
दो पल की जिंदगी पाना, ये हमसे तुम जरा पूछो

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
August 23, 2013

बहुत सुन्दर रचना,अपने प्रिय के खो जाने या दूर चले जाने पर दिन में भी अंधेरा छाया हुआ महसूस होता है।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 23, 2013

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार .

akraktale के द्वारा
December 22, 2012

वाह! बहुत ही प्रवाहमयी और भाव पूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें आदरणीय मदन जी.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    December 27, 2012

    Thanks .”Thank you so much ,i am obliged for you being on this status

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    December 27, 2012

    अनेकानेक धन्यवाद सकारात्मक टिप्पणी हेतु.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    December 27, 2012

    Thanks Shalini Kaushikji.

Santlal Karun के द्वारा
December 20, 2012

आदरणीय मदन मोहन सक्सेना जी, प्यार में दूरी और असीमित दूरी के दर्द को बयाँ करती अत्यंत संवेदनात्मक, मन को छूती मार्मिक रचना; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “फागुन गुम हुआ कैसे ,क्या तुमको कुछ चला मालूम कहा हमने ज़माने से की हमको कुछ नहीं मालूम पाकर के जिसे दिल में ,हुए हम खुद से बेगाने उनका पास न आना ,ये हमसे तुम जरा पुछो बसेरा जिनकी सूरत का हमेशा आँख में रहता उनका न नजर आना, ये हमसे तुम जरा पूछो जीवितं है तो जीने का मजा सब लोग ले सकते जीवितं रहके, मरने का मजा हमसे जरा पूछो”

Santlal Karun के द्वारा
December 20, 2012

आदरणीय मदन मोहन सक्सेना जी, प्रेम-परिपाक के भावों से भरी ह्रदय को छूती अत्यंत मार्मिक रचना, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Santlal Karun के द्वारा
December 20, 2012

आदरणीय मदन मोहन सक्सेना जी, प्रेम-परिपाक के भावों से भरी ह्रदय को छूती अत्यंत मार्मिक रचना, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “फागुन गुम हुआ कैसे ,क्या तुमको कुछ चला मालूम कहा हमने ज़माने से की हमको कुछ नहीं मालूम पाकर के जिसे दिल में ,हुए हम खुद से बेगाने उनका पास न आना ,ये हमसे तुम जरा पुछो बसेरा जिनकी सूरत का हमेशा आँख में रहता उनका न नजर आना, ये हमसे तुम जरा पूछो जीवितं है तो जीने का मजा सब लोग ले सकते जीवितं रहके, मरने का मजा हमसे जरा पूछो रोशन है जहाँ सारा मुहब्बत की बदौलत ही अँधेरा दिन में दिख जाना ,ये हमसे तुम जरा पूछो”


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