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ग़ज़ल

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सजा क्या खूब मिलती है , किसी से दिल लगाने की
तन्हाई की महफ़िल में आदत हो गयी गाने की

हर पल याद रहती है , निगाहों में बसी सूरत
तमन्ना अपनी रहती है खुद को भूल जाने की

उम्मीदों का काजल जब से आँखों में लगाया है
कोशिश पूरी रहती है , पत्थर से प्यार पाने की

अरमानो के मेले में जब ख्बाबो के महल टूटे
बारी तब फिर आती है , अपनों को आजमाने की

मर्जे इश्क में अक्सर हुआ करता है ऐसा भी
जीने पर हुआ करती है ख्बहिश मौत पाने की



ग़ज़ल
मदन मोहन सक्सेना

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
August 22, 2013

प्रेम और विरह पर कसम-कस भरे पल। बहुत सुन्दर रचना। गरीब के करीब आकर। चली दिल भरमा कर।। हो गयी दृग ओझल। हुआ न तेरा चेहरा ओझल।।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 23, 2013

    ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ..सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला

bdsingh के द्वारा
August 22, 2013

समर्पण भाव से किया गया प्रेम,होता है वास्तविक प्रेम।  दिल लगाने के बाद विरह पर कसम-कस पूर्ण पल। सुन्दर रचना।  व्लाग की प्रशंसा के लिए बहुत-बहुत  धन्यवाद। गरीब के करीब आकर। चली दिल भरमा कर।। हो गयी दृग ओझल। हुआ न तेरा चेहरा ओझल।।    प्रेम और विरह के बीच दर्द का एक और रूप–”माँ-बाप की व्यथा” पढ़ने का कण्ट करें।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 23, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद

RaJ के द्वारा
January 2, 2013

वाह वाह मदन साहब

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 2, 2013

काफ़िया और रदीफ सही मेल ! मदन जी बधाई !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 2, 2013

क़ाफिया और रदीफ का अच्छा मेल लगाया है ! मदन जी बधाई !


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