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ग़ज़ल (हालात)

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दीवारें ही दीवारें नहीं दीखते अब घर यारों
बड़े शहरों के हालात कैसे आज बदले है.

उलझन आज दिल में है कैसी आज मुश्किल है
समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं

जिसे देखो बही क्यों आज मायूसी में रहता है
दुश्मन दोस्त रंग अपना, समय पर आज बदले हैं

जीवन के सफ़र में जो पाया है सहेजा है
खोया है उसी की चाह में ,ये दिल क्यों मचले है

समय ये आ गया कैसा कि मिलता अब समय ना है
रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ushataneja के द्वारा
April 27, 2013

समय ये आ गया कैसा कि मिलता अब समय ना है रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं… बढ़िया प्रस्तुति. सादर

ushataneja के द्वारा
April 27, 2013

समय ये आ गया कैसा कि मिलता अब समय ना है रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं… बहुत बढ़िया प्रस्तुति.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    April 29, 2013

    आप का तहेदिल से शुक्रिया मेरी इस रचना को अपना समय देने के लिए एवं अपनी बहुमूल्य प्रतिकिर्या देने के लिए. स्नेह युहीं बनायें रखें . सादर !

sudhajaiswal के द्वारा
April 10, 2013

मदन जी, हालत बदल गए क्योंकि ईमानदारी कहीं खो गई है इसलिए रिश्ते बेमानी हो गए | अच्छी गजल के लिए बधाई |

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    April 10, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .

alkargupta1 के द्वारा
April 10, 2013

सक्सेना जी , आज समय के बदलने के साथ ही रिश्तों की किताब के पन्ने धुंधले पड़ चुके हैं …… आज के हालतों का सही चित्रण किया है ….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 9, 2013

रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं सही हालत दिखाती गजल पर दाद कबूल करें सर जी

Sushma Gupta के द्वारा
April 8, 2013

आदरणीय मदनमोहन जी,सही कहा है आपने आज समय बदल रहा है , हालात बदल रहे है ,लोग आज मायूस हैं ,और दिशाहीन भी… सुन्दर अभिव्यक्ति …वधाई…लिखते रहिएगा …


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