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मरती हुई इंसानियत

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जयपुर की घटना को आज टीवी पर देखा.
सड़क पर एक महिला की लाश.
बेबस घायल बच्चा
और अपनी किस्मत पर रोते उसके पिता को.. !
और देखा मंहगी गाड़ी
जो पास से गुजर रही थी
और उन में बैठे दो कौड़ी की औकात वाले
अपने की इंसान कहने वाले
समाज के लोगों को !
देखा
बस में से झांकते लोगो को
जो सिर्फ नाटक देखने और तालियाँ पीटने की ट्रेनिग लेते हैं बड़े बड़े आदर्शो से
जिनमे कभी कभी मैं खुद भी होता हूँ !
और देखा.. मरती हुई इंसानियत को
बहते हुए भावनाओं के खून को.. !
बहुत दर्द हुआ
आखिर क्यों
आज का मानब इतना स्वार्थी हो गया है
आखिर क्यों
कामचोरी धूर्तता चमचागिरी का अब चलन है
बेअरथ से लगने लगे है ,युग पुरुष जो कह गए है
दूसरो का किस तरह नुकसान हो सब सोचते है
त्याग ,करुना, प्रेम ,क्यों इस जहाँ से बह गए है.

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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
August 9, 2013

आप की यह पंक्ति प्ररणादायक है— जिनमें कभी कभी मैं  खुद भी होता हूँ। व्यक्ति को अपने कर्तव्य का एहसास होता है।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 20, 2013

    सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला.मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .

bdsingh के द्वारा
August 9, 2013

आप की यह पंक्ति प्रेरणादायकहै—- व्यक्ति को अपने कर्तव्य के एहसास के लिए, जिनमें कभी कभी मैं खुद भी होता हूँ। 

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 20, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .

bdsingh के द्वारा
August 9, 2013

व्यक्ति उपदेश के नाम पर आगे,  कर्तव्य निभाने के नाम पर पीछे। आप पंक्ति—-जिनमें कभी कभी मैं खुद भी होता हूँ।  यह पंक्ति प्रेरणादायक है।

Abhinav kumar के द्वारा
August 7, 2013

आदरणीय मदनमोहन जी..आपने पुरी घटना की तस्वीर उतार दी ..आपका कौशल झलकता है ….अत्यंत मार्मिक,,,एवं ह्रदयस्पर्शी .. !!

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 8, 2013

    बहुत शुक्रिया होंसला अफजाई के लिए.

yogi sarswat के द्वारा
April 18, 2013

देखा बस में से झांकते लोगो को जो सिर्फ नाटक देखने और तालियाँ पीटने की ट्रेनिग लेते हैं बड़े बड़े आदर्शो से जिनमे कभी कभी मैं खुद भी होता हूँ ! और देखा.. मरती हुई इंसानियत को बहते हुए भावनाओं के खून को.. ! बहुत दर्द हुआ आखिर क्यों आज का मानब इतना स्वार्थी हो गया है इंसानियत सच में कहीं दफ़न हो गयी है ! सार्थक शब्द लिखे हैं आपने श्री मदन मोहन जी !

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    April 18, 2013

    आप का बहुत शुक्रिया होंसला अफजाई के लिए.”

yogi sarswat के द्वारा
April 18, 2013

देखा बस में से झांकते लोगो को जो सिर्फ नाटक देखने और तालियाँ पीटने की ट्रेनिग लेते हैं बड़े बड़े आदर्शो से जिनमे कभी कभी मैं खुद भी होता हूँ ! और देखा.. मरती हुई इंसानियत को बहते हुए भावनाओं के खून को.. ! बहुत दर्द हुआ आखिर क्यों आज का मानब इतना स्वार्थी हो गया है थोड़ी सी जो इंसानियत बची हुई है वो भी धीरे धीरे मर रही है ! शर्म आती है हमें अपने इंसान होने पर ! बहुत सार्थक शब्द लिखे हैं आपने मदन मोहन जी !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 16, 2013

जिनमे कभी कभी मैं खुद भी होता हूँ ! और देखा.. मरती हुई इंसानियत को बहते हुए भावनाओं के खून को.. ! बहुत दर्द हुआ आखिर क्यों आज का मानब इतना स्वार्थी हो गया है मदन जी सुन्दर ..मन को छूने वाली रचना प्रश्न चिन्ह हो लगा ही है हर जगह … भ्रमर ५

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    April 18, 2013

    रचना पसंद करने और बहुमूल्य सन्देश के लिए आप सभी का तहे दिल से हार्दिक आभार

bhagwanbabu के द्वारा
April 16, 2013

इंसानो के अन्दर के इंसानियत मर चुकी है… सब स्वार्थी हो चुके है… नामर्द हो चुके है….. सब इंतजार करते रहते है कि कोई आगे बढ़े सबसे पहले…. फिर देखिये कैसे भीड़ लग जाती है… लोग भेड़ की चाल चलने लगे है… एक के पीछे एक… इस्लिए ऐसा होता है… अच्छा लेख है… धन्यवाद…

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    April 18, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .आशा है आगे भी आपका आशीर्वाद मेरी रचनाओं को मिलता रहेगा .आभार


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