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ग़ज़ल

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कल तलक लगता था हमको शहर ये जाना हुआ
इक शख्श अब दीखता नहीं तो शहर ये बीरान है

बीती उम्र कुछ इस तरह कि खुद से हम न मिल सके
जिंदगी का ये सफ़र क्यों इस कदर अंजान है

गर कहोगें दिन को दिन तो लोग जानेगें गुनाह
अब आज के इस दौर में दिखते नहीं इन्सान है

इक दर्द का एहसास हमको हर समय मिलता रहा
ये बक्त की साजिश है या फिर बक्त का एहसान है

गैर बनकर पेश आते, बक्त पर अपने ही लोग
अपनो की पहचान करना अब नहीं आसान है

प्यासा पथिक और पास में बहता समुन्द्र देखकर
जिंदगी क्या है मदन , कुछ कुछ हुयी पहचान है

ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shweta के द्वारा
August 19, 2013

umdaa………

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 20, 2013

    रचना पसंद करने और बहुमूल्य सन्देश के लिए आप सभी का तहे दिल से हार्दिक आभार

bdsingh के द्वारा
August 10, 2013

समाजिक जीवन जिसमें आपसी सहयोग की प्रधानता होती है। इसका गिरता स्तर। बढ़ती स्वार्थपरता, बदलते दौर की अच्छी अभिव्यक्ति

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 20, 2013

    सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला

Shweta के द्वारा
August 2, 2013

So beautiful ghazal

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 2, 2013

    आपका हृदयसे आभार . सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .

Shweta के द्वारा
August 2, 2013

वास्तविकता से भरपूर रचना …… सादर

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 2, 2013

    सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार .

AMAR LATA के द्वारा
May 30, 2013

NICE SHARING madan jee. simply superb. Good one. Plz visit my blog and give feedback.

bhagwanbabu के द्वारा
May 7, 2013

बेहतर है ये आईना कि कलम आपके पास है होता तो सब के पास है फिर भी सभी अंजान है.. . http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/05/05/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%A4-%E2%80%9C%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%A6%E2%80%9D-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82/

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 7, 2013

    Thanks.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 8, 2013

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार . सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .


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