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ग़ज़ल

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जालिम लगी दुनिया हमें हर शख्श  बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से

नफरत से की गयी चोट का हर जख्म हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से

प्यार के एहसास  से जब जब रहे हम बेखवर
तब तब लगा हम को की हम जी रहे बेकार से

इजहार राज ए  दिल का बह जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से

जब प्यार से इंकार हो तो इकरार से है बो भला
आने लगेगा तब मज़ा फिर  इकरार का इंकार से

क्या कहूँ कि आज कल का ये समय कैसा तो है
आदमी ब्यापार से तो प्यार करता , दूर रहता प्यार से

ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

August 28, 2013

बढ़िया.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 29, 2013

    शुभकामनाएं.ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

meenakshi के द्वारा
August 2, 2013

मदन जी उपरोक्त ” ग़ज़ल ” की – “आदमी ब्यापार से तो प्यार करता , दूर रहता प्यार से ” आज का सच है . आज भावनाएं लुप्त होती जा रहीं हैं . बहुत सुन्दर लिखा है . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 2, 2013

    आपकी उत्साह बढ़ाने वाली प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद !

ऋषभ शुक्ला के द्वारा
May 14, 2013

सुन्दर ………..बहूत सुन्दर . इसे भी पढ़े -http://rushabhshukla.jagranjunction.com/

bhagwanbabu के द्वारा
May 14, 2013

कहने की बहुत खूब कोशिश आपने… . बहुत अच्छा… बधाई..


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