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ग़ज़ल(ये कैसा परिवार )

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ग़ज़ल (ये कैसा परिवार )

मेरे जिस टुकड़े को दो पल की दूरी बहुत सताती थी
जीवन के चौथेपन में अब ,बह सात समन्दर पार हुआ .

रिश्तें नातें -प्यार की बातें , इनकी परबाह कौन करें
सब कुछ पैसा ले डूबा ,अब जाने क्या ब्यबहार हुआ ..

दिल में दर्द नहीं उठता है भूख गरीबी की बातों से
धर्म देखिये कर्म देखिये सब कुछ तो ब्यापार हुआ …

मेरे प्यारे गुलशन को न जानें किसकी नजर लगी है
युबा को अब काम नहीं है बचपन अब बीमार हुआ ….

जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए
शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ …..

ताई ताऊ , दादा दादी ,मौसा मौसी दूर हुएँ अब
हम दो और हमारे दो का ये कैसा परिवार हुआ.

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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79 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
March 26, 2016

जय श्री राम मदन मोहन जी सुन्दर भावपूर्ण कविता के लिए साधुवाद होली की हार्दिक शुभकामनाये

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 28, 2016

    होली की हार्दिक शुभकामनाये , प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार ,

rameshagarwal के द्वारा
March 26, 2016

जय श्री राम मदन मोहन जी मूल्य विहीन और अंग्रेज़ी शिक्षा का असर भारतीय मूल्यों के अंग्रेजीकरण बहुत सार्थक कविता

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 28, 2016

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार

harirawat के द्वारा
March 1, 2016

मदन मोहन सक्सेना जी, नमस्ते ! दिल को झकझोरने वाली गजल ! साधुवाद ! हरेन्द्र जागते रहो !

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 4, 2016

    प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है !!

pkdubey के द्वारा
February 29, 2016

आज के समाज की हकीकत बयां करती ग़ज़ल | सादर साधुवाद आदरणीय |

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 4, 2016

    आपकी सार्थक प्रतिक्रया हेतु शुभकामनाओं सहित आप सभी का हार्दिक साभार ,धन्यबाद …

arunakapoor के द्वारा
April 21, 2015

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति!

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 1, 2015

    आपकी सार्थक प्रतिक्रया हेतु शुभकामनाओं सहित आप सभी का हार्दिक साभार ,धन्यबाद ……

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    June 24, 2014

    आपकी सराहना मेरे लिये किसी पुरस्कार से कम नहीं है…..तहे दिल से आपका शुक्रगुजार हूँ, हार्दिक आभार

bdsingh के द्वारा
October 8, 2013

बदलते दौर में रिश्तों की वास्तिकता व्यक्त करती अच्छी गजल। सक्सेना जी कई बार प्रयास करने पर भी अपनी बात आप तक नहीं पहुँचा सका। माँ-बाप की व्यथा    पर एक निगाह की अपेक्षा ।

pratima gupta के द्वारा
October 6, 2013

अति उत्तम

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 7, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .आभार

pratima gupta के द्वारा
October 6, 2013

अति उत्तम………….

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 7, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .आशा है आगे भी आपका आशीर्वाद मेरी रचनाओं को मिलता रहेगा .आभार

deepakbijnory के द्वारा
August 22, 2013

जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए वाह बहूत सुंदर मदन मोहन जी मन मोह लिया

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 23, 2013

    ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .

bdsingh के द्वारा
August 8, 2013

संयक्त परिवार की बात दूर। एकल परिवार हो रहे कमजोर।। पढ़-लिख कर जब बच्चे हुए सयाने। भूल कर घर परिवार हो गये बेगाने।।                    सभ्यता में गिरावट,धन के सम्मुख भावनाओं की कद्र नहीं,बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 8, 2013

    बहुत शुक्रिया होंसला अफजाई के लिए.

bdsingh के द्वारा
August 8, 2013

संयुक्त परिवार की बात दूर । एकल परिवार हो रहे कमजोर।। पढ़-लिख कर जब बच्चे हुए सयाने। भूल कर घर परिवार हो गये बेगाने।।               सभ्यता में गिरावट,धन के सम्मुख की कद्र नहीं, बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 8, 2013

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार ..सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .

bdsingh के द्वारा
August 8, 2013

संयुक्त परिवार की बात तो दूर,एकल परिवार की जड़ें हो रही कमजोर, पढ-लिख कर जब बच्चे हुए सयाने। भूल कर घर परिवार हो गये बगाने।। सभ्यता में गिरावट,धन के सम्मुख भावनावों की कर्द नहीं,अच्छी अभिव्यक्ति

Shweta के द्वारा
August 2, 2013

वास्तविकता से भरपूर रचना …… सादर

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 2, 2013

    आपकी उत्साह बढ़ाने वाली प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद !

Shweta के द्वारा
August 2, 2013

वास्तविकता को बखूबी पिरोया है आपने …… सादर

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 2, 2013

    धन्यवाद !. आपकी प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा।

meenakshi के द्वारा
August 1, 2013

मदन जी , वास्तव में वर्तमान के सामाजिक चलन का बेहतरीन उदाहरण अपने काव्य / ग़ज़ल के माध्यम से किया है . बहुत-२ बधाई . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 2, 2013

    आपकी प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा।धन्यवाद !.

Sushma Gupta के द्वारा
June 7, 2013

आज की पारिवारिक परिस्थियों को वखूबी वयां करती आपकी यह गजल सुन्दर व् सराहनीय है, मदन मोहन जी .. मेरे ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रया प्रदान करें ,धन्यबाद .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    June 11, 2013

    आभार . आप का बहुत बहुत धन्यवाद्

yogi sarswat के द्वारा
June 6, 2013

दिल में दर्द नहीं उठता है भूख गरीबी की बातों से धर्म देखिये कर्म देखिये सब कुछ तो ब्यापार हुआ … मेरे प्यारे गुलशन को न जानें किसकी नजर लगी है युबा को अब काम नहीं है बचपन अब बीमार हुआ …. आधुनिकता के फर्जी रूप को दिखाती सार्थक रचना श्री मदन मोहन जी ! बहुत खूब

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    June 6, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.जो आप ने रचना का अवलोकन किया ! आभार .

alkargupta1 के द्वारा
June 4, 2013

सक्सेना जी , वर्तमान पारी दृश्य में सभी रिश्ते बेगाने से हो गए हैं आधुनिकता और भौतिक चकाचौंध ने इन रिश्तों को स्वार्थ में कहीं न कहीं लिप्त कर दिया है …. अति उत्तम प्रस्तुति के लिए बधाई

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    June 5, 2013

    हार्दिक धन्यवाद .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    June 5, 2013

    आभार ..मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.जो आप ने रचना का अवलोकन किया !

alkargupta1 के द्वारा
June 4, 2013

सक्सेना जी , वर्तमान परिदृश्य में सभी रिश्ते बेगाने से लगते हैं ,, आधुनिकता और भौतिक चकाचौंध ने इन रिश्तों को स्वार्थ में लिप्त कर दिया है …. अति उत्तम प्रस्तुति के लिए बधाई

bhagwanbabu के द्वारा
June 4, 2013

बहुत ही अच्छी बातें ग़ज़ल के माध्यम से आपने बताई… .. बधाई…

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    June 4, 2013

    हार्दिक धन्यवाद .सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला

jlsingh के द्वारा
June 2, 2013

आदरणीय मदन मोहन जी, सादर अभिवादन! आज के माहौल के अनुकूल गजल! जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ ….. अब तो यही लगता है — उल जलूल बातें करना आज का शिष्टाचार हुआ! सादर बधाई!

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    June 3, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.जो आप ने रचना का अवलोकन किया !

Rajeev Varshney के द्वारा
May 31, 2013

आदरणीय मदन मोहन जी, अब तो एक बच्चे के परिवार का चलन है. क्या एक बच्चे के परिवार के बाद चाचा ताऊ बुआ मामा मौसी आदि रिश्ते बचेंगे. क्या राखी का त्यौहार मनाया जा सकेगा. सुन्दर रचना, बधाई. राजीव वार्ष्णेय

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला – हार्दिक धन्यवाद

Rajeev Varshney के द्वारा
May 31, 2013

आदरणीय मदन मोहन जी, अब तो एक बच्चे के परिवार का चलन हो गया है. क्या एक बच्चे के परिवार के चलते चाचा, ताऊ, बुआ, मामा, मौसी, आदि रिश्ते बचेंगे. क्या राखी और भाई दूज के त्यौहार मनाये जा सकेंगे. परिवार के वर्तमान स्वरुप को चित्रित करती सुन्दर रचना के लिए बधाई.  शुभकामनाओ सहित, राजीव वार्ष्णेय

Rajeev Varshney के द्वारा
May 31, 2013

आदरणीय मदन मोहन जी परिवारों के वर्तमान स्वरुप को चित्रित करती सुन्दर रचना के लिए बधाई.  दो बच्चो की बात छोडिये अब तो एक का ही चलन हो गया है. क्या एक बच्चे के परिवार के बाद चाचा, ताऊ, मामा, बुआ, मौसी आदि रिश्ते बचेंगे. क्या राखी और भाई दूज के त्यौहार मनेंगे? शुभकामनाओ सहित सादर, राजीव वार्ष्णेय

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.जो आप ने रचना का अवलोकन किया ! भविष्य में ऐसी ही कृपा का आकांक्षी रहूँ बहुत आभार गा! धन्यवाद!

Rajesh Dubey के द्वारा
May 31, 2013

समाज के नब्ज को छूती गजल. आज धन तो है पर खुशी नहीं.रिश्ते-नाते सभी दूर हो गए.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    जो आप ने रचना का अवलोकन किया ! भविष्य में ऐसी ही कृपा का आकांक्षी रहूँ बहुत आभार गा! धन्यवाद!

Rajesh Dubey के द्वारा
May 31, 2013

समाज के नब्ज को चुटी गजल. आज धन तो है पर खुशी नहीं.रिश्ते-नाते सभी दूर हो गए.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद .आशा है आगे भी आपका आशीर्वाद मेरी रचनाओं को मिलता रहेगा .आभार .

sudhajaiswal के द्वारा
May 30, 2013

अच्छी रचना के लिए बधाई मदन जी |

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ..आभार .

priti के द्वारा
May 30, 2013

आज की तेज रफ़्तार जिंदगी की यही सच्चाई है……….सुंदर रचना …….हार्दिक बधाई ! सक्सेना जी …………….

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .आशा है आगे भी आपका आशीर्वाद मेरी रचनाओं को मिलता रहेगा .आभार .तहे दिल से आपका शुक्रगुजार हूँ

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 7, 2013

    रचना पसंद करने और सन्देश के लिए आप का तहे दिल से हार्दिक आभार

Sumit के द्वारा
May 30, 2013

Yा adhunikta ka asar hai madan ji

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    तहे दिल से आपका शुक्रगुजार हूँ

Sumit के द्वारा
May 30, 2013

Ye hi adhunikta ka asar hai madan ji

harirawat के द्वारा
May 30, 2013

मदन मोहन जी आप ने गजल नाम से आज के समाज को एक सन्देश दे दिया ! आपने सुन्दर शब्दों शब्दों को जोड़ कर आधुनिकता के स्वछंद प्रगतिशील फैशन, खान पान ने अपने पराये नास्ते रिश्तेदारी को स्वार्थ की जंजीरों में जकड दिया है ! प्रेरणा दायक प्रस्तुति !

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    आपकी सराहना मेरे लिये किसी पुरस्कार से कम नहीं है…..तहे दिल से आपका शुक्रगुजार हूँ

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 7, 2013

    रचना पसंद करने और बहुमूल्य सन्देश के लिए आप का तहे दिल से हार्दिक आभार

nishamittal के द्वारा
May 30, 2013

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति मदनमोहन जी बधाई

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .आशा है आगे भी आपका आशीर्वाद मेरी रचनाओं को मिलता रहेगा .आभार .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 7, 2013

    रचना पसंद करने और बहुमूल्य सन्देश के लिए आप का तहे दिल से हार्दिक आभार

AJAY KUMAR CHAUDHARY के द्वारा
May 30, 2013

बहुत अच्छे मदन मोहन जी…! जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ ….. ताई ताऊ , दादा दादी ,मौसा मौसी दूर हुएँ अब हम दो और हमारे दो का ये कैसा परिवार हुआ. शुक्रिया…….!

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    आभार .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 7, 2013

    रचना पसंद करने के लिए आप का तहे दिल से हार्दिक आभार

AJAY KUMAR CHAUDHARY के द्वारा
May 30, 2013

बहुत अच्छे मदन मोहन जी… जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ ….. ताई ताऊ , दादा दादी ,मौसा मौसी दूर हुएँ अब हम दो और हमारे दो का ये कैसा परिवार हुआ. शुक्रिया……!

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    आप का तहे दिल से हार्दिक आभार

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 7, 2013

    हार्दिक आभार

AJAY KUMAR CHAUDHARY के द्वारा
May 30, 2013

बहुत अच्छे मदन मोहन जी… जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ ….. ताई ताऊ , दादा दादी ,मौसा मौसी दूर हुएँ अब हम दो और हमारे दो का ये कैसा परिवार हुआ. शुक्रिया……..!

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 31, 2013

    रचना पसंद करने और बहुमूल्य सन्देश के लिए आप सभी का तहे दिल से हार्दिक आभार

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 7, 2013

    बहुमूल्य सन्देश के लिए आप का तहे दिल से हार्दिक आभार


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