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हार जीत

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पाने को आतुर रहतें हैं खोने को तैयार नहीं है
जिम्मेदारी ने मुहँ मोड़ा सुबिधाओं की जीत हो रही.

साझा करने को ना मिलता , अपने गम में ग़मगीन हैं
स्वार्थ दिखा जिसमें भी यारों उससे केवल प्रीत हो रही .

कहने का मतलब होता था ,अब ये बात पुरानी है
जैसा देखा बैसी बातें .जग की अब ये रीत हो रही …

अब खेलों में है राजनीति और राजनीति ब्यापार हुई
मुश्किल अब है मालूम होना ,किस्से किसकी मीत हो रही

क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में
संग साथ की हार हुई और तन्हाई की जीत हो रही

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jaishree Verma के द्वारा
August 3, 2013

समय के बदलाव के साथ बढती स्वार्थी प्रवृत्ति हमारे जीवन की मिठास को निगल रही है !क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में ! स्वार्थी प्रवृति को दर्शाती अच्छी प्रस्तुति मदन मोहन सक्सेना जी !

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 5, 2013

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार ..सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .

Jaishree Verma के द्वारा
August 3, 2013

क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में | सही कहा आपने स्वार्थ हमारे जीवन की मिठास को निगल रहा है मदन मोहन सक्सेना जी !

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 5, 2013

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार .

Jaishree Verma के द्वारा
August 3, 2013

क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में ! स्वार्थ हमारे जीवन की मिठास को निगल रहा है मदन मोहन सक्सेना जी !

seemakanwal के द्वारा
August 2, 2013

सुन्दर रचना आभार .

seemakanwal के द्वारा
August 1, 2013

सुन्दर रचना आभार .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 2, 2013

    अनेकानेक धन्यवाद सकारात्मक टिप्पणी हेतु.

seemakanwal के द्वारा
August 1, 2013

सुन्दर ,सार्थक .समयानुकूल रचना आभार .

seemakanwal के द्वारा
August 1, 2013

sundar sarthak smyanukul rchna .abhar

manoranjanthakur के द्वारा
August 1, 2013

.बहुत सुंदर रचना …हार के आगे जीत है .. बधाई

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 2, 2013

    अनेकानेक धन्यवाद

manoranjanthakur के द्वारा
August 1, 2013

हार के आगे जीत है …बहुत सुंदर रचना …बधाई


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