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ग़ज़ल (दिल की दास्ताँ)

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ग़ज़ल (दिल की दास्ताँ)

मिली दौलत ,मिली शोहरत,मिला है मान उसको क्यों
मौका जानकर अपनी जो बात बदल जाता है

किसी का दर्द पाने की तमन्ना जब कभी उपजे
जीने का नजरिया फिर उसका बदल जाता है

चेहरे की हकीकत को समझ जाओ तो अच्छा है
तन्हाई के आलम में ये अक्सर बदल जाता है

किसको दोस्त माने हम और किसको गैर कह दें हम
जरुरत पर सभी का जब हुलिया बदल जाता है

दिल भी यार पागल है ना जाने दीन दुनिया को
किसी पत्थर की मूरत पर अक्सर मचल जाता है

क्या बताएं आपको हम अपने दिल की दास्ताँ
जितना दर्द मिलता है ये उतना संभल जाता है

ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shweta के द्वारा
August 19, 2013

उम्दा प्रस्तुति ….

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 20, 2013

    आप का तहे दिल से हार्दिक आभार

Shweta के द्वारा
August 19, 2013

उम्दा ग़ज़ल ………

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
August 15, 2013

किसको दोस्त माने हम और किसको गैर कह दें हम जरुरत पर सभी का जब हुलिया बदल जाता है प्रिय मदन मोहन जी ..सटीक अभिव्यक्ति आज के समाज का …उहापोह है जीवन में कैसे जिया जाए ..सुन्दर भ्रमर ५

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 20, 2013

    रचना पसंद करने और बहुमूल्य सन्देश के लिए आप सभी का तहे दिल से हार्दिक आभार

Jaishree Verma के द्वारा
August 12, 2013

किसको दोस्त माने हम और किसको गैर कह दें हम जरुरत पर सभी का जब हुलिया बदल जाता है – सुन्दर ग़ज़ल मदन मोहन सक्सेना जी !

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 20, 2013

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .

seemakanwal के द्वारा
August 10, 2013

सुन्दर ग़ज़ल आभार .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 20, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद. सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला

harirawat के द्वारा
August 8, 2013

मदन मोहन जी एक सुन्दर गजल आज के राजनेताओं पर फिट बैठती है, बधाई !

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    August 8, 2013

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार ..सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .


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