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आँख मिचौली

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आँख मिचौली

जब से मैंने गाँव क्या छोड़ा
शहर में ठिकाना खोजा
पता नहीं आजकल
हर कोई मुझसे
आँख मिचौली का खेल क्यों खेला करता है
जिसकी जब जरुरत होती है
बह बहाँ से गायब मिलता है
और जब जिसे जहाँ नहीं होना चाहियें
जबरदस्ती कब्ज़ा जमा लेता है
कल की ही बात है
मेरी बहुत दिनों के बात उससे मुलाकात हुयी
सोचा गिले शिक्बे दूर कर लूँ
पहले गाँव में तो उससे रोज का मिलना जुलना होता था
जबसे मुंबई में इधर क्या आया
या कहिये
मुंबई जैसेबड़े शहरों की दीबारों के बीच आकर फँस गया
पूछा
क्या बात है
आजकल आती नहीं हो इधर।
पहले तो हमारे आंगन भर-भर आती थी
दादी की तरह छत पर पसरी रहती थी हमेशा
तंग दिल पड़ोसियों ने
अपनी इमारतों की दीवार क्या ऊँची की
तुम तो इधर का रास्ता ही भूल गयी
तुम्हें अक्सर सुबह देखता हूं
कि पड़ी रहती हो
तंगदिल और धनी लोगों
के छज्जों पर
हमारी छत तो
अब तुम्हें भाती ही नहीं है
क्या करें
बहुत मुश्किल होती है
जब कोई अपना (बर्षों से परिचित)
आपको आपके हालत पर छोड़कर
चला जाता है
लेकिन याद रखो
ऊँची इमारतों के ऊँचे लोग
बड़ी सादगी से लूटते हैं
फिर चाहे वो दौलत हो या इज्जत हो
महीनों के बाद मिली हो
इसलिए सारी शिकायतें सुना डाली
उसने कुछ बोला नहीं
बस हवा में खुशबु घोल कर
खिड़की के पीछे चली गई
सोचा कि उसे पकड़कर आगोश में भर लूँ
धत्त तेरी की
फिर गायब
ये महानगर की धूप भी न
बिलकुल तुम पर गई है
हमेशा आँख मिचौली का खेल खेला करती है
बिना ये जाने
कि इस समय इस का मौका है भी या नहीं …

मदन मोहन सक्सेना

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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhagwan Babu के द्वारा
September 16, 2013

खूबसूरत …

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 16, 2013

    धन्यबाद …आपकी सार्थक प्रतिक्रया हेतु शुभकामनाओं सहित हार्दिक साभार.

yogi sarswat के द्वारा
September 16, 2013

बहुत मुश्किल होती है जब कोई अपना (बर्षों से परिचित) आपको आपके हालत पर छोड़कर चला जाता है लेकिन याद रखो ऊँची इमारतों के ऊँचे लोग बड़ी सादगी से लूटते हैं फिर चाहे वो दौलत हो या इज्जत हो महीनों के बाद मिली हो इसलिए सारी शिकायतें सुना डाली उसने कुछ बोला नहीं बस हवा में खुशबु घोल कर खिड़की के पीछे चली गई सोचा कि उसे पकड़कर आगोश में भर लूँ! बहुत बहुत सुन्दर रचना श्री मदन मोहन जी ! जितने सुन्दर शब्द उतनी ही सुन्दर अभिव्यक्ति !

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 16, 2013

    आपकी सार्थक प्रतिक्रया हेतु शुभकामनाओं सहित हार्दिक साभार धन्यबाद …

yogi sarswat के द्वारा
September 16, 2013

बहुत मुश्किल होती है जब कोई अपना (बर्षों से परिचित) आपको आपके हालत पर छोड़कर चला जाता है लेकिन याद रखो ऊँची इमारतों के ऊँचे लोग बड़ी सादगी से लूटते हैं फिर चाहे वो दौलत हो या इज्जत हो महीनों के बाद मिली हो इसलिए सारी शिकायतें सुना डाली उसने कुछ बोला नहीं बस हवा में खुशबु घोल कर खिड़की के पीछे चली गई सोचा कि उसे पकड़कर आगोश में भर लूँ बहुत बहुत सुन्दर शब्द और अभिव्यक्ति श्री मदन मोहन जी ! बहुत ही खूबसूरत रचना

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 16, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 16, 2013

    Thanks YogiJi.

nishamittal के द्वारा
September 16, 2013

सुन्दर प्रस्तुति मदनमोहन जी

bhanuprakashsharma के द्वारा
September 15, 2013

सही कहा आपने। हम हर दिन आंख मिचौली ही तो खेल रहे हैं। सुंदर रचना।  

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 15, 2013

    धन्यवाद.शुभकामनाएं

rajanidurgesh के द्वारा
September 15, 2013

मदनजी बहुत सटीक लिखा है आपने. “तुम्हें अक्सर सुबह देखता हूं कि पड़ी रहती हो तंगदिल और धनी लोगों के छज्जों पर” बहुत घनी अभिव्यक्ति है.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 15, 2013

    बहुत धन्यवाद.शुभकामनाएं

bdsingh के द्वारा
September 14, 2013

बहुत सुन्दर रचना।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 14, 2013

    शुभकामनाएं. धन्यवाद

bdsingh के द्वारा
September 13, 2013

बहुत अच्छी रचना।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 14, 2013

    बहुत धन्यवाद.शुभकामनाएं.

bdsingh के द्वारा
September 13, 2013

निश्छल प्यार और अमीरी बहुत बढ़िया आँख मिचौली लिखा है आपने।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 14, 2013

    बहुत धन्यवाद.

Pradeep Kesarwani के द्वारा
September 13, 2013

सुंदर प्रस्तुति… मार्मिक कविता आभार…..

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 13, 2013

    शुभकामनाएं. बहुत बहुत धन्यवाद.

September 13, 2013

nice

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 13, 2013

    ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.शुभकामनाएं.ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.शुभकामनाएं.

September 13, 2013

पहले तो हमारे आंगन भर-भर आती थी दादी की तरह छत पर पसरी रहती थी हमेशा तंग दिल पड़ोसियों ने अपनी इमारतों की दीवार क्या ऊँची की तुम तो इधर का रास्ता ही भूल गयी बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 13, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद.शुभकामनाएं.


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