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रहमत

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रहमत

मन्नत पूरी करना है खुदा की बंदगी कर लो
जियो और जीने दो खुशहाल जिंदगी कर लो
मर्जी जब खुदा की हो तो पूरे अपने सपने हों
रहमत जब खुदा की हो तो बेगाने भी अपने हों

रहमत जब खुदा की हो तो बंजर भी चमन होता
खुशिया रहती दामन में और जीवन में अमन होता
मर्जी बिन खुदा यारो तो जर्रा हिल नहीं सकता
खुदा जो रूठ जाये तो मय्यसर न कफ़न होता

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
September 17, 2013

ईश्वर की रहमत और बड़ों की दुआएं बहुत ज़रूरी हैं.बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं साभार

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 18, 2013

    स्नेह युहीं बनायें रखें … सादर !

deepakbijnory के द्वारा
September 17, 2013

अच्छी prastuti

kantagogia के द्वारा
September 16, 2013

खुदा ही देता है सब कुछ, यह यकीन कर ले बन्दे, उसकी मरजी के बिना नहीं हिलता पत्ता भी यहां  बहुत खूब मदन जी

Pradeep Kesarwani के द्वारा
September 16, 2013

मार्मिक कविता बधाई ….

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 16, 2013

    ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.शुभकामनाएं.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 16, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद.


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