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ग़ज़ल (रिश्तें नातें )

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मेरे जिस टुकड़े को दो पल की दूरी बहुत सताती थी
जीवन के चौथेपन में अब ,बह सात समन्दर पार हुआ

रिश्तें नातें -प्यार की बातें , इनकी परबाह कौन करें
सब कुछ पैसा ले डूबा ,अब जाने क्या व्यवहार हुआ

दिल में दर्द नहीं उठता है भूख गरीबी की बातों से
धर्म देखिये कर्म देखिये सब कुछ तो ब्यापार हुआ

मेरे प्यारे गुलशन को न जानें किसकी नजर लगी है
युवा को अब काम नहीं है बचपन अब बीमार हुआ

जाने कैसे ट्रेन्ड हो गए मम्मी पापा फ्रेंड हो गए
शर्म हया और लाज ना जानें आज कहाँ दो चार हुआ

ताई ताऊ , दादा दादी ,मौसा मौसी दूर हुएँ अब
हम दो और हमारे दो का ये कैसा परिवार हुआ

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
October 9, 2013

बहुत विचारणीय वास्तविकता व्यक्त करती रचना।

prerana के द्वारा
October 4, 2013

बहुत ही सुन्दर ! यथार्थ चित्रण

bdsingh के द्वारा
September 25, 2013

बहुत सुन्दर रचना।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 26, 2013

    शुभकामनाओं सहित हार्दिक साभार धन्यबाद

bdsingh के द्वारा
September 25, 2013

अंधी भौतिकता की दौड़ में रिश्ते-नाते सब बेकार हुए।  धर्म , कर्म सब कारोबार हो गये हैं। बहुत अच्छी रचना।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 26, 2013

    आपकी सार्थक प्रतिक्रया हेतु शुभकामनाओं सहित हार्दिक साभार धन्यबाद

jlsingh के द्वारा
September 24, 2013

वाकई गजल मार्मिक और समयानुकूल है दादा दादी को छोडिय, अब तो पति पत्नी भी नदी के दो कूल हैं!

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 24, 2013

    हार्दिक धन्यवाद.बहुत शुक्रिया होंसला अफजाई के लिए.

nishamittal के द्वारा
September 23, 2013

मर्मस्पर्शी रचना मेरे जिस टुकड़े को दो पल की दूरी बहुत सताती थी जीवन के चौथेपन में अब ,बह सात समन्दर पार हुआ

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 23, 2013

    बहुत शुक्रिया होंसला अफजाई के लिए.

nishamittal के द्वारा
September 23, 2013

दिल को छूने वाली प्रस्तुति

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 23, 2013

    हार्दिक धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
September 23, 2013

बहुत सुन्दर प्रस्तुति मदन जी दिल को छूने वाली रचना मेरे जिस टुकड़े को दो पल की दूरी बहुत सताती थी जीवन के चौथेपन में अब ,बह सात समन्दर पार हुआ

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    September 23, 2013

    सुखद एहसास की अनुभूति हुई आपकी उपस्थिति मात्र से और आपकी प्रतिक्रिया से संबल मिला – हार्दिक धन्यवाद


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