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ग़ज़ल(मन करता है)

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ग़ज़ल(मन करता है)

लल्लू पंजू पप्पू फेंकू राबड़ी को अब देख देख कर
अब मेरा भी राजनीती में मन आने को करता है

सच्ची बातें खरी खरी अब किसको अच्छी लगती हैं
चिकनी चिपुडी बातों से मन बहलाने को करता है

रुखा सूखा गन्दा पानी पीकर कैसे रह लेते थे
इफ्तार में मुर्गा ,बिरयानी मन खाने को करता है

हिन्दू जाता मंदिर में और मुस्लिम जाता मस्जिद में
मुझको बोट जहाँ पर मिल जाए, मन जाने को करता है

मेरी मर्जी मेरी इच्छा जैसा चाहूँ बैसा कर दूँ
जो बिरोध में आये उसको, मन निपटाने को करता है

ग़ज़ल प्रस्तुति
मदन मोहन सक्सेना

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

meenakshi के द्वारा
October 23, 2013

सच्ची बातें खरी खरी अब किसको अच्छी लगती हैं- बहुत सही कहा मदन जी , शुभकामनाएं ! नोट :- एक बात और आपकी पोस्ट में मेरे कमेंट्स बड़ी मुश्किल से जाते हैं ‘ वर्ड प्रेस एरर ‘ देखते -२ ….. धन्यवाद ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 24, 2013

    आपकी प्यार भरी, उत्साह बढ़ाने वाली प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद !

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 10, 2013

तहे दिल से आपका आभार शालिनी जी.

October 10, 2013

मेरी मर्जी मेरी इच्छा जैसा चाहूँ बैसा कर दूँ जो बिरोध में आये उसको, मन निपटाने को करता है aapki shandar abhivyakti dekh man to hamara bhi yahi karta hai .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 10, 2013

    प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है !!


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