मैं, लेखनी और जिंदगी

गीत, ग़ज़ल, बिचार और लेख

205 Posts

1310 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 10271 postid : 645083

ग़ज़ल (जग की रीत)

  • SocialTwist Tell-a-Friend

ग़ज़ल (जग की रीत)

पाने को आतुर रहतें हैं खोने को तैयार नहीं है
जिम्मेदारी ने मुहँ मोड़ा ,सुबिधाओं की जीत हो रही

साझा करने को ना मिलता , अपने गम में ग़मगीन हैं
स्वार्थ दिखा जिसमें भी यारों उससे केवल प्रीत हो रही

कहने का मतलब होता था ,अब ये बात पुरानी है
जैसा देखा बैसी बातें .जग की अब ये रीत हो रही

अब खेलों में है राजनीति और राजनीति ब्यापार हुई
मुश्किल अब है मालूम होना ,किस से किसकी मीत हो रही

क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में
संग साथ की हार हुई और तन्हाई की जीत हो रही

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

5 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shakuntlamishra के द्वारा
December 27, 2013

गजल हकीकत कि तरफ जाती है अच्छा लगा !

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    December 30, 2013

    आभारी हूँ ! सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है ,

sadguruji के द्वारा
November 20, 2013

आदरणीय मदन मोहन सक्सेना जी,सार्थक और अच्छी गजल है.आप का ब्लॉग “मैं , लेखनी और ज़िन्दगी” देखा वो भी बेहतर लगा.आप को बधाई.

kantagogia के द्वारा
November 14, 2013

सत्य है मदन जी आज समाज केवल स्वार्थ कि जय करता है | सभी केवल अपना हित चाहते हैं | सामाजिक मूल्य , परम्पराएं सभी केवल नाम ही रह गएँ हैं . सुंदर ग़ज़ल कान्ता गोगिया


topic of the week



latest from jagran