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गज़ल ( अहसास)

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गज़ल ( अहसास)

हर इंसान के जीवन में ,ऐसे कुछ अहसास होते हैं
भले मुद्दत गुजर जाये , बे दिल के पास होते हैं

जो दिल कि बात सुनता है बही दिलदार है यारों
दौलत बान अक्सर तो असल में दास होते हैं

अपनापन लगे जिससे बही तो यार अपना है
आजकल तो स्वार्थ सिद्धि में रिश्ते नाश होते हैं

धर्म अब आज रुपया है कर्मअब आज रुपया है
जीवन केखजानें अब, क्यों सत्यानाश होते हैं

समय रहते अगर चेते तभी तो बात बनती है
बरना नरक है जीबन , पीढ़ियों में त्रास होते हैं

गज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjeevtrivedi के द्वारा
December 5, 2013

सुन्दर शब्द रचना है…

sanjeevtrivedi के द्वारा
December 5, 2013

सुन्दर शब्द रचना है बधाई….

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
November 30, 2013

मदन मोहन जी मांफ कीजियेगा एक अनुरोध है – प्रथम दो पंक्तिओं को आप यदि इस तरह लिखे तो ग़ज़ल कि खूबसूरती और ज्यादा बढ़ जायेगी / हर इंसान के जीवन में ऐसे कुछ अहसास होते हैं भले मुद्दत गुजर जाये , बे दिल के पास होते हैं आपको सलाह देने कि गुस्ताखी करने के लिए मांफ कीजियेगा / लेकिन मैंने देखा है ग़ज़ल कि प्रथम दो पंक्तियाँ इसी तरह तुकांत होती है / ग़ज़ल बहुत खूबसूरत है //

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
November 30, 2013

मदन मोहन जी मांफ कीजियेगा एक अनुरोध है – प्रथम दो पंक्तिओं को आप यदि इस तरह लिखे तो ग़ज़ल कि खूबसूरती और ज्यादा बढ़ जायेगी / हर इंसान के जीवन में ऐसे कुछ अहसास होते हैं भले मुद्दत गुजर जाये , बे दिल के पास होते हैं आपको सलाह देने कि गुस्ताखी करने के लिए मांफ कीजियेगा / लेकिन मैंने देखा है ग़ज़ल कि प्रथम दो पंक्तियाँ इसी तरह तुकांत होती है / ग़ज़ल बहुत खूबसूरत है /


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