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ग़ज़ल (ये रिश्तें)

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ग़ज़ल (ये रिश्तें)

ये रिश्तें काँच से नाजुक जरा सी चोट पर टूटे
बिना रिश्तों के क्या जीवन ,रिश्तों को संभालों तुम

जिसे देखो बही मुँह पर ,क्यों मीठी बात करता है
सच्चा क्या खरा क्या है जरा इसको खँगालों तुम

हर कोई मिला करता बिछड़ने को ही जीबन में
जीबन के सफ़र में जो ,मिले अपना बना लो तुम

सियासत आज ऐसी है नहीं सुनती है जनता की
अपनी बात कैसे भी सियासत को बता लो तुम

अगर महफूज़ रहकर के बतन महफूज रखना है
मदन ,अपने नौनिहालों हो बिगड़ने से संभालों तुम

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shweta Misra के द्वारा
March 13, 2014

खनकते ..दरकते ….महकते ….रिश्ते ये …अजीब सजीव रिश्ते बहुत ही सुन्दर भावों को शब्दों की लड़ियों में पिरोया है ……सादर

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 14, 2014

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार . सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .

deepak pande के द्वारा
March 13, 2014

बहुत खूबसूरत रचना शायद अंतिम पंक्ति में नौनिहालों को सम्भालों तुम होगा कृपया जांच करें

January 9, 2014

जिसे देखो बही मुँह पर ,क्यों मीठी बात करता है सच्चा क्या खरा क्या है जरा इसको खँगालों तुम………….सार्थक सिख देती पक्तियां……………..

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    January 13, 2014

    मेरे ब्लौग आप का स्वागत है , आभारी हूँ !

harirawat के द्वारा
December 25, 2013

मदन मोहन जी, जैसा नाम वैसे ही आपके उत्तम विचार ! जीवन की असलियत को बयान करने वाली सुन्दर गजल ! साधुवाद ! हरेन्द्र जागते रहो

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    December 26, 2013

    सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है . प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ !

sanjeevtrivedi के द्वारा
December 24, 2013

बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ है…

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    December 26, 2013

    सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है , आभारी हूँ !

Imam Hussain Quadri के द्वारा
December 24, 2013

बहुत ही सुन्दर बात कही आपने .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    December 24, 2013

    आदरणीय जी ,सादर अभिवादन ! प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है !!

Imam Hussain Quadri के द्वारा
December 24, 2013

बहुत ही अच्छी बात है मैं कहना चाहूंगा के : मुशककत कि ज़िल्लत है जिसने उठायी जहां में मिली आखिर उसको बड़ाई किसी ने बगैर इसके हरगिज़ न पाई फ़ज़ीलत न इज़ज़त न फरमरवाई

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    December 24, 2013

    प्रतिक्रियार्थ आभारी हूँ ! सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है !!


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