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ग़ज़ल (जीबन :एक बुलबुला )

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ग़ज़ल (जीबन :एक बुलबुला )

गज़ब हैं रंग जीबन के गजब किस्से लगा करते
जबानी जब कदम चूमे बचपन छूट जाता है

बंगला ,कार, ओहदे को पाने के ही चक्कर में
सीधा सच्चा बच्चों का आचरण छूट जाता है

जबानी के नशें में लोग क्या क्या ना किया करते
ढलते ही जबानी के बुढ़ापा टूट जाता है

समय के साथ बहना ही असल तो यार जीबन है
समय को गर नहीं समझे समय फिर रूठ जाता है

जियो ऐसे कि औरों को भी जीने का मजा आये
मदन ,जीबन क्या ,बुलबुला है, आखिर फुट जाता है

मदन मोहन सक्सेना

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
February 1, 2014

सुन्दर भाव  

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    February 3, 2014

    आपका हृदयसे आभार .

nishamittal के द्वारा
January 31, 2014

सुन्दर प्रस्तुति जबानी के नशें में लोग क्या क्या ना किया करते ढलते ही जबानी के बुढ़ापा टूट जाता है

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    February 3, 2014

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार . सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .

sadguruji के द्वारा
January 28, 2014

समय के साथ बहना ही असल तो यार जीबन है समय को गर नहीं समझे समय फिर रूठ जाता है जियो ऐसे कि औरों को भी जीने का मजा आये मदन ,जीबन क्या ,बुलबुला है, आखिर फुट जाता है.उपयोगो और सार्थक कविता. आसरणीय मदन मोहन सक्सेना जी अच्छी गजल लिखने के लिए बधाई.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 24, 2014

क्षण भंगुर जीवन का आइना है यह ग़ज़ल , बधाई ,मदनजी

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 24, 2014

छण भंगुर जीवन की हकीक़त का आइना है  यह गज़ल ,बधाई मदनजी . सादर , निर्मला सिंह गौर


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