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क्या सच्चा है क्या है झूठा

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क्या सच्चा है क्या है झूठा अंतर करना नामुमकिन है
हमने खुद को पाया है बस खुदगर्जी के घेरे में

एक जमी बख्शी थी कुदरत ने हमको यारो लेकिन
हमने सब कुछ बाट दिया है मेरे में और तेरे में

आज नजर आती मायूसी मानबता के चेहरे पर
अपराधी को शरण मिली है आज पुलिस के डेरे में

बीरो की क़ुरबानी का कुछ भी असर नहीं दीखता है
जिसे देखिये चला रहा है क्यों सारे तीर अँधेरे में

जीवन बदला भाषा बदली सब कुछ अपना बदल गया है
अनजानापन लगता है अब खुद के आज बसेरे में

क्या सच्चा है क्या है झूठा अंतर करना नामुमकिन है.
हमने खुद को पाया है बस खुदगर्जी के घेरे में

मदन मोहन सक्सेना

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 12, 2014

अंतर्मन को छू लेनेवाली पंक्तियाँ ! मदन जी ! बधाई !!

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 12, 2014

    बहुत धन्यवाद् ,

kavita1980 के द्वारा
March 7, 2014

बहुत खूब मदन जी अनजानापन लगता  है अब खुद के आज बसेरे में –

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 10, 2014

    आप का बहुत धन्यवाद् ,

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 7, 2014

    आप का बहुत बहुत धन्यवाद् ,

aditya upadhyay के द्वारा
March 6, 2014

यह रंगमंच का मेला है , हमने और तुमने देखा है .. असल वास्तविकता क्या है ?? कौन जनता क्या सच्चा है क्या झूठा है ?? बहुत सुन्दर पंक्तियाँ सर , धन्यवाद ऐसे विचारों के लिए .. आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 5, 2014

हमने सब कुछ बाँट दिया है मेरे में और तेरे में ,मदन जी बहुत बड़े सच को उजागर करती काव्यानुभूति ,सादर बधाई

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 6, 2014

    Thanks Nirmla singh gaur ji for your comment

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 5, 2014

हमने सब कुछ बाँट दिया है मेरे में और तेरे में ,वाह,मदन जी ,कविता की हर पंक्ति ही सार्थक है ,सादर बधाई

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 6, 2014

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार . सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .

ANJALI ARORA के द्वारा
March 5, 2014

बेहतरीन

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 6, 2014

    सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .,प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार .

ANJALI ARORA के द्वारा
March 5, 2014

बेहतरीन 

deepakbijnory के द्वारा
March 5, 2014

जीवन बदला भाषा बदली सब कुछ अपना बदल गया है अनजानापन लगता है अब खुद के आज बसेरे में वाह मदन मोहन जी बहुत खूब http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/03/05/नारी-तू-नारायणी-कविता/

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 6, 2014

    आपकी प्रतिक्रिया से उर्जा मिलती है ,आप का बहुत बहुत धन्यवाद्


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