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मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक १ , मार्च २०१४ में

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मेरी ग़ज़ल युबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक १ , मार्च २०१४ में
प्रिय मित्रों मुझे बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी ग़ज़लयुबा सुघोष ,बर्ष -३ , अंक १ , मार्च २०१४ में प्रकाशित हुयी है . आप भी अपनी प्रतिक्रिया से अबगत कराएँ .

कैसी सोच अपनी है किधर हम जा रहें यारों
गर कोई देखना चाहें बतन मेरे बो आ जाये

तिजोरी में भरा धन है मुरझाया सा बचपन है
ग़रीबी भुखमरी में क्यों जीबन बीतता जाये

ना करने का ही ज़ज्बा है ना बातों में ही दम दीखता
हर एक दल में सत्ता की जुगलबंदी नजर आयें .

कभी बाटाँ धर्म ने है कभी जाति में खो जाते
हमारें रहनुमाओं का, असर सब पर नजर आये

ना खाने को ना पीने को ,ना दो पल चैन जीने को
ये कैसा तंत्र है यारों , ये जल्दी से गुजर जाये

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ritu Gupta के द्वारा
March 6, 2014

वह बहुत खूब बधाई मदन जी

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 7, 2014

    आप का बहुत बहुत धन्यवाद् ,


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