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ग़ज़ल(क्या खोया और क्या पाया)

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ग़ज़ल(क्या खोया और क्या पाया)

अँधेरे में रहा करता है साया साथ अपने पर
बिना जोखिम उजाले में है रह पाना बहुत मुश्किल

ख्बाबो और यादों की गली में उम्र गुजारी है
समय के साथ दुनिया में है रह पाना बहुत मुश्किल ..

कहने को तो कह लेते है अपनी बात सबसे हम
जुबां से दिल की बातो को है कह पाना बहुत मुश्किल

ज़माने से मिली ठोकर तो अपना हौसला बढता
अपनों से मिली ठोकर तो सह पाना बहुत मुश्किल

कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है
क्या खोया और क्या पाया कह पाना बहुत मुश्किल

मदन मोहन सक्सेना

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
April 4, 2014

कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ हैं ,क्या खोया और क्या पाया कह पाना बहुत मुश्किल ,ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं मदन जी क्यों कि यही सच है और हर एक व्यक्ति की दास्तान भी .सादर बधाई

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    April 4, 2014

    बहुत बहुत आभार


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