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बचपन यार अच्छा था

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बचपन यार अच्छा था

जब हाथों हाथ लेते थे अपने भी पराये भी
बचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता था

बारीकी जमाने की, समझने में उम्र गुज़री
भोले भाले चेहरे में सयानापन समाता था

मिलते हाथ हैं लेकिन दिल मिलते नहीं यारों
मिलाकर हाथ, पीछे से मुझको मार जाता था

सुना है आजकल कि बह नियमों को बनाता है
बचपन में गुरूजी से जो अक्सर मार खाता था

उधर माँ बाप तन्हा थे इधर बेटा अकेला था
पैसे की ललक देखो दिन कैसे दिखाता था

जिसे देखे हुआ अर्सा , उसका हाल जब पूछा
बाकी ठीक है कहकर वह ताना मार जाता था

मदन मोहन सक्सेना

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
July 1, 2014

बहुत हृदयस्पर्शी और सारगर्भित रचना सर.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    July 18, 2014

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार

sanjeevtrivedi के द्वारा
June 26, 2014

मदन मोहन जी क्या बात है बचपन याद दिला लिया…..


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