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किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है

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किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है

किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है
बिना मेहनत के मंजिल कब किसके हाथ आती है

क्यों हर कोई परेशां है बगल बाले की किस्मत से
दशा कैसी भी अपनी हो किसको रास आती है

दिल के पास है लेकिन निगाहों से जो ओझल है
ख्बाबों में अक्सर वह हमारे पास आती है

अपनों संग समय गुजरे इससे बेहतर क्या होगा
कोई तन्हा रहना नहीं चाहें मजबूरी बनाती है

दिल की बात दिल में ही दफ़न कर लो तो अच्छा है
पत्थर दिल ज़माने में कहीं ये बात भाती है

भरोसा खुद पर करके जो समय की नब्ज़ को जानें
“मदन ” हताशा और नाकामी उनसे दूर जाती है

मदन मोहन सक्सेना

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    July 18, 2014

    आपकी उत्साह बढ़ाने वाली प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 16, 2014

भरोसा खुद पर करके जो समय की नब्ज़ को जानें “मदन ” हताशा और नाकामी उनसे दूर जाती है ……….बहुत बड़ा सच दुनिया को बदल ने की बजाय स्वयं को बदल लें ,व्यवहारिक कुशलता का संदेश देती रचना हार्दिक बधाई मदन जी .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    July 18, 2014

    आपकी प्यार भरी, उत्साह बढ़ाने वाली प्रतिक्रिया मिली बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद !

July 15, 2014

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति मदन जी .बधाई

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    July 18, 2014

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार


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