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ग़ज़ल ( मम्मी तुमको क्या मालूम )

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ग़ज़ल ( मम्मी तुमको क्या मालूम )

सुबह सुबह अफ़रा तफ़री में फ़ास्ट फ़ूड दे देती माँ तुम
टीचर क्या क्या देती ताने , मम्मी तुमको क्या मालूम

क्या क्या रूप बना कर आती ,मम्मी तुम जब लेने आती
लोग कैसे किस्से लगे सुनाने , मम्मी तुमको क्या मालूम

रोज पापा जाते पैसा पाने , मम्मी तुम घर लगी सजाने
पूरी कोशिश से पढ़ते हम , मम्मी तुमको क्या मालूम

घर मंदिर है ,मालूम तुमको पापा को भी मालूम है जब
झगड़े में क्या बच्चे पाएं , मम्मी तुमको क्या मालूम

क्यों इतना प्यार जताती हो , मुझको कमजोर बनाती हो
दूनियाँ बहुत ही जालिम है , मम्मी तुमको क्या मालूम

ग़ज़ल ( मम्मी तुमको क्या मालूम )
मदन मोहन सक्सेना

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
November 28, 2014

सक्सेना जी बड़ी ही खूबसूरत गजल व्यंग करती हुई गजल आपने लिखी हैं बच्चे का दर्द शिकायते डॉ शोभा

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
November 26, 2014

yahi to aashchary ka vishay hai ki bachche ye samajhte hain ki unki mummy ko kuchh bhi maloom nahi hai .


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