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ग़ज़ल ( कहतें दीपक जलता है )

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ग़ज़ल ( कहतें दीपक जलता है )

किस की कुर्वानी को किसने याद रखा है दुनियाँ में
जलता तेल औ बाती है कहतें दीपक जलता है

पथ में काँटें लाख बिछे हो मंजिल मिल जाती है उसको
बिन भटके जो इधर उधर ,राह पर अपनी चलता है

मिली दौलत मिली शोहरत मिला है यार सब कुछ क्यों
जैसा मौका बैसी बातें , जो पल पल बात बदलता है

छोड़ गया जो पत्थर दिल ,जिसने दिल को दर्द दिया है
दिल भी कितना पागल है ये उसके लिए मचलता है

दो पल गए बनाने में औ दो पल गए निभाने में
रिश्तों के कोलाहल में ये जीवन ऐसे ही चलता है

ग़ज़ल ( कहतें दीपक जलता है )

प्रस्तुति
मदन मोहन सक्सेना

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
December 6, 2014

बढ़िया प्रस्तुति मदनमोहन जी

alkargupta1 के द्वारा
December 6, 2014

सुन्दर अर्थ पूर्ण रचना


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