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ग़ज़ल (दुआ)

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ग़ज़ल (दुआ)

हुआ इलाज भी मुश्किल ,नहीं मिलती दबा असली
दुआओं का असर होता दुआ से काम लेता हूँ

मुझे फुर्सत नहीं यारों कि माथा टेकुं दर दर पे
अगर कोई डगमगाता है उसे मैं थाम लेता हूँ

खुदा का नाम लेने में क्यों मुझसे देर हो जाती
खुदा का नाम से पहले ,मैं उनका नाम लेता हूँ

मुझे इच्छा नहीं यारों कि मेरे पास दौलत हो
सुकून हो चैन हो दिल को इसी से काम लेता हूँ

सब कुछ तो बिका करता मजबूरी के आलम में
मैं सांसों के जनाज़े को सुबह से शाम लेता हूँ

सांसे है तो जीवन है तभी है मूल्य मेहनत का
जितना हो जरुरी बस उसी का दाम लेता हूँ

ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
October 7, 2015

आदरणीय मदन मोहन सक्सेना जी ! मुझे इच्छा नहीं यारों कि मेरे पास दौलत हो सुकून हो चैन हो दिल को इसी से काम लेता हूँ ! अच्छी ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई !

deepak pande के द्वारा
October 6, 2015

WAAH मदन जी ग़ज़ल में आपका सम्पूर्ण व्यक्तित्व झलक रहा है सुन्दर रचना http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2015/09/30/इन-बेजुबानों-का-क्या-कोई-ख/

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    October 7, 2015

    बहुत बहुत आभार आपका


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