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ग़ज़ल(ये रिश्तें)

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ग़ज़ल(ये रिश्तें)

ये रिश्तें काँच से नाजुक जरा सी चोट पर टूटे
बिना रिश्तों के क्या जीवन ,रिश्तों को संभालों तुम

जिसे देखो बही मुँह पर ,क्यों मीठी बात करता है
सच्चा क्या खरा क्या है जरा इसको खँगालों तुम

हर कोई मिला करता बिछड़ने को ही जीबन में
मिले, जीबन के सफ़र में जो उन्हें अपना बना लो तुम

सियासत आज ऐसी है नहीं सुनती है जनता की
अपनी बात कैसे भी उनसे तुम बता लो तुम

अगर महफूज़ रहकर के बतन महफूज रखना है
मदन कहे ,अपने नौनिहालों हो बिगड़ने से संभालों तुम

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
November 5, 2015

अवश्य ही रिश्ते सहेजने का विषय है , न की राजनीती करने का ,सादर आदरणीय |

ashasahay के द्वारा
November 5, 2015

बहुत सुन्दर रचना मदन मोहन सक्सेना जी,आपने देश के प्रति अपने रिश्तों को सम्हालने की बात की है समसामयिक समस्या पर द़ष्टि केन्द्रित है। बधाई, ।  आशा सहाय

nishamittal के द्वारा
November 5, 2015

सार्थक सन्देश देती प्रस्तुति

Shobha के द्वारा
November 5, 2015

श्री मदन जी बहुत सुंदर गजल ख़ास कर “अगर महफूज़ रहकर के बतन महफूज रखना है मदन कहे ,अपने नौनिहालों हो बिगड़ने से संभालों तुम” सबसे मुश्किल यही है दिल्ली में तो बुरा हाल है


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