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ग़ज़ल (बक्त कब किसका हुआ)

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ग़ज़ल (बक्त कब किसका हुआ)

बक्त कब किसका हुआ जो अब मेरा होगा
बुरे बक्त को जानकर सब्र किया मैनें

किसी को चाहतें रहना कोई गुनाह तो नहीं
चाहत को इज़हार न करने का गुनाह किया मैंने

रिश्तों की जमा पूंजी मुझे बेहतर कौन जानेगा
तन्हा रहकर जिंदगी में गुजारा किया मैंने

अब तू भी है तेरी यादों की खुशबु भी है
दूर रहकर तेरी याद में हर पल जिया मैनें

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है
जब दर्द को दबा जानकार पिया मैंने

ग़ज़ल (बक्त कब किसका हुआ)

मदन मोहन सक्सेना



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
December 27, 2015

सचमुच वक़्त कभी किसी का नहीं हुआ मदन जी । बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है आपकी । मैं समझ सकता हूँ आपकी भावनाएं ।


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