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एक कथा (देवउठनी एकादशी /देवप्रबोधिनी एकादशी और तुलसी विवाह )

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भगवान विष्णु के स्वरुप शालिग्राम और माता तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस साल तुलसी विवाह 23 नवंबर 2015 को है।देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन मनाए जाने वाले इस मांगलिक प्रसंग के शुभ अवसर पर भक्तगण घर की साफ -सफाई करते हैं और रंगोली सजाते हैं। शाम के समय तुलसी चौरा यानि तुलसी के पौधे के पास गन्ने का भव्य मंडप बनाकर उसमें साक्षात् नारायण स्वरूप शालिग्राम की मूर्ति रखते हैं और फिर विधि-विधानपूर्वक उनके विवाह को संपन्न कराते हैं।

एक लड़की जिसका नाम वृंदा था ,राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु जी की परम भक्त थी,बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा,पूजा किया करती थी। जब वे बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल के दानव राज जलंधर से हो गया,जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुए थे .वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी हमेशा अपने पति की सेवा किया करती। कुछ समय बाद सुर और असुरों में भयंकर युद्ध हुआ। जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा। स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेंगे,में पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते में अपना संकल्प नही छोडूगी।जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी। उनके व्रत के प्रभाव से देवता जलंधर को ना जीत सके. सारे देवता जब हारने लगे तो वे सभी भगवान विष्णु जी के पास पहुंचे , उन्होने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता । देवता बोले – भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है। भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा,वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छूए। इधर जैसे ही इनका संकल्प टूटा,उधर युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार गिराया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में आकर गिरा .जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?
कौन हो आप जिसका स्पर्श मैने अनजाने किया है ,तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके, वृंदा सारी बात समझ गई,। उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, भगवान तुंरत पत्थर के हो गये, सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्राथना करने लगी. तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी.। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा , आज से इनका नाम तुलसी होगा, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप मे भी रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी पत्र के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी पत्र के भोग स्वीकार नहीं करुंगा।तभी से आज के दिन तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगेऔर तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है. देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में भी मनाया जाता है

एक कथा (देवउठनी एकादशी /देवप्रबोधिनी एकादशी और तुलसी विवाह )

मदन मोहन सक्सेना

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
November 23, 2015

जय श्री राम मदन मोहन जी सार्थक लेख तुलसी विवाह और देव उठनी एकादशी की हार्दिक बधाई.हिन्दु अपनी मानयताओ का अभी भी पालन कर रहे अच्छा उम्मीद है आने वाली पीडी भूलेगी नहीं.


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