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ग़ज़ल (होली )

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ग़ज़ल (होली )

मन से मन भी मिल जाये , तन से तन भी मिल जाये
प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है

मौसम आज रंगों का छायी अब खुमारी है
चलों सब एक रंग में हो कि आयी आज होली है

ले के हाथ हाथों में, दिल से दिल मिला लो आज
यारों कब मिले मौका अब छोड़ों ना कि होली है

क्या जीजा हों कि साली हों ,देवर हो या भाभी हो
दिखे रंगनें में रंगानें में , सभी मशगूल होली है

ना शिकबा अब रहे कोई , ना ही दुश्मनी पनपे
गले अब मिल भी जाओं सब, आयी आज होली है

प्रियतम क्या प्रिया क्या अब सभी रंगने को आतुर हैं
चलो हम भी बोले होली है तुम भी बोलो होली है .

ग़ज़ल (होली )

मदन मोहन सक्सेना

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
March 25, 2016

आदरणीय मदन मोहन सक्सेना जी ! बहुत सुन्दर और विचारणीय रचना ! होली की बहुत बहुत बधाई

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 28, 2016

    प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार , सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है .

vikaskumar के द्वारा
March 23, 2016

होली के रंग में रंगी गजल .

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    March 28, 2016

    सदैव मेरे ब्लौग आप का स्वागत है . प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार


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