मैं, लेखनी और जिंदगी

गीत, ग़ज़ल, बिचार और लेख

194 Posts

1310 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 10271 postid : 1150381

जिसे देखिये चला रहा है सारे तीर अँधेरे में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

जिसे देखिये चला रहा है सारे तीर अँधेरे में

क्या सच्चा है क्या है झूठा अंतर करना नामुमकिन है.
हमने खुद को पाया है बस खुदगर्जी के घेरे में

एक जमीं बख्शी थी कुदरत ने हमको यारों लेकिन
हमने सब कुछ बाँट दिया मेरे में और तेरे में

आज नजर आती मायूसी मानबता के चहेरे पर
अपराधी को शरण मिली है आज पुलिस के डेरे में

बीरो की क़ुरबानी का कुछ भी असर नहीं दीखता है
जिसे देखिये चला रहा है सारे तीर अँधेरे में

जीवन बदला ,भाषा बदली, सब कुछ अपना बदल गया है
क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

3 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
April 8, 2016

जय श्री राम मैडम मोहन जी बहुत सुन्दर भाव आज इंसान ने इंसानियत भूल गया ज्यादा ज्यादा मिलने की नियत से मानवता के नियम भूल गया चाहते की सब की दौलत हमें मिले छाए किसी तरह दुसरे की फिकर नहीं आदमी सड़क में घायल कोइ मदद के लिए तैयार नहीं शायद कलयुग का असर हो लेकिन सुधार की उम्मीद नहीं कविता के लिए साधुवाद

Jitendra Mathur के द्वारा
April 7, 2016

आप ठीक कह रहे हैं मदन जी ।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    April 7, 2016

    रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार


topic of the week



latest from jagran