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ग़ज़ल (इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर )

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हर सुबह रंगीन अपनी शाम हर मदहोश है
वक़्त की रंगीनियों का चल रहा है सिलसिला

चार पल की जिंदगी में ,मिल गयी सदियों की दौलत
जब मिल गयी नजरें हमारी ,दिल से दिल अपना मिला

नाज अपनी जिंदगी पर ,क्यों न हो हमको भला
कई मुद्द्दतों के बाद फिर अरमानों का पत्ता हिला

इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर
रफ्ता रफ्ता ढह गया, तन्हाई का अपना किला

वक़्त भी कुछ इस तरह से आज अपने साथ है
चाँद सूरज फूल में बस यार का चेहरा मिला

दर्द मिलने पर शिकायत ,क्यों भला करते मदन
दर्द को देखा जो दिल में मुस्कराते ही मिला

ग़ज़ल (इश्क क्या है ,आज इसकी लग गयी हमको खबर )

मदन मोहन सक्सेना



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
April 7, 2016

इश्क क्या है, आज इसकी लग गयी हमको खबर, रफ्ता-रफ्ता ढह गया, तन्हाई का अपना किला । क्या बात है मदन जी ! बहुत खूब ! दिल को छू गई आपकी बात ।

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    April 7, 2016

    हार्दिक शुभकामनाये , प्रोत्साहन के लिए आपका हृदयसे आभार ,


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