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ग़ज़ल (सब सिस्टम का रोना रोते)

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सुबह हुयी और बोर हो गए
जीवन में अब सार नहीं है

रिश्तें अपना मूल्य खो रहे
अपनों में वो प्यार नहीं है

जो दादा के दादा ने देखा
अब बैसा संसार नहीं है

खुद ही झेली मुश्किल सबने
संकट में परिवार नहीं है

सब सिस्टम का रोना रोते
खुद बदलें ,तैयार नहीं है

मेहनत से किस्मत बनती है
मदन आदमी लाचार नहीं है

ग़ज़ल (सब सिस्टम का रोना रोते)
मदन मोहन सक्सेना



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
May 6, 2016

जय श्री राम मदन मोहन जी बहुत अच्छी तस्बीर देश और समाज की कविता के माध्यम से प्रस्तुत की भारतीय संस्कार भूल हर एक चीज बिन म्हणत जल्दी चाहना चाहते ज्यादातर लोग अपने दुःख से नहीं लेकिन दुसरो के सुख से दुखी संतोष नाम की चीज नहीं.कविता के लिए साधुवाद.

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 13, 2016

    अनेकानेक धन्यवाद सकारात्मक टिप्पणी हेतु.

Shobha के द्वारा
May 5, 2016

श्री मदन जी सब सिस्टम का रोना रोते खुद बदलें ,तैयार नहीं है सही

    Madan Mohan saxena के द्वारा
    May 13, 2016

    शुक्रिया हौसलाअफ़्ज़ाई के लिए


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