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ग़ज़ल (किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है)

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ग़ज़ल (किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है)

दिल के पास है लेकिन निगाहों से जो ओझल है
ख्बाबों में अक्सर वह हमारे पास आती है

अपनों संग समय गुजरे इससे बेहतर क्या होगा
कोई तन्हा रहना नहीं चाहें मजबूरी बनाती है

किसी के हाल पर यारों,कौन कब आसूँ बहाता है
बिना मेहनत के मंजिल कब किसके हाथ आती है

क्यों हर कोई परेशां है बगल बाले की किस्मत से
दशा कैसी भी अपनी हो किसको रास आती है

दिल की बात दिल में ही दफ़न कर लो तो अच्छा है
पत्थर दिल ज़माने में कहीं ये बात भाती है

भरोसा खुद पर करके जो समय की नब्ज़ को जानें
“मदन ” हताशा और नाकामी उनसे दूर जाती है

प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
May 27, 2016

जय श्री राम बहुत अच्छी कविता सच है की लोग पड़ोसी की सम्पन्नता की वजह से ज्यादा दुखी रहते नेता तो बिना मेहनत सब प् जाते ७ पीडियो का इंतज़ाम करते बहुत अच्छी भावनाए व्यक्त की.

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
May 26, 2016

भरोसा खुद पर करके जो समय की नब्ज़ को जानें “मदन ” हताशा और नाकामी उनसे दूर जाती है ……..ओम शांति शांति


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