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ग़ज़ल (आये भी अकेले थे और जाना भी अकेला है)

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पैसोँ की ललक देखो दिन कैसे दिखाती है
उधर माँ बाप तन्हा हैं इधर बेटा अकेला है

रुपये पैसोँ की कीमत को वह ही जान सकता है
बचपन में गरीवी का जिसने दंश झेला है

अपने थे ,समय भी था ,समय वह और था यारों
समय पर भी नहीं अपने बस मजबूरी का रेला है

हर इन्सां की दुनियाँ में इक जैसी कहानी है
तन्हा रहता है भीतर से बाहर रिश्तों का मेला है

समय अच्छा बुरा होता ,नहीं हैं दोष इंसान का
बहुत मुश्किल है ये कहना किसने खेल खेला है

जियो ऐसे कि हर इक पल ,मानो आख़िरी पल है
आये भी अकेले थे और जाना भी अकेला है

ग़ज़ल (आये भी अकेले थे और जाना भी अकेला है)
मदन मोहन सक्सेना



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
July 15, 2016

जय श्री राम मदन मोहन जी जीवन का सत्य आपने कविता के माध्यम से बहुत ख़ूबसूरती से वर्णन की.गरीबी बहुत बड़ा अभिशाप है.जैसे फेस बुक में दोस्तों की लाइन लगी रहती जो झालावा है इस तरह २ अच्छे दोस्त ५० बनावटी दोस्तों से अच्छे है.बहुत सुन्दर प्रस्तुति.


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