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ग़ज़ल (बचपन यार अच्छा था)

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ग़ज़ल (बचपन यार अच्छा था)

जब हाथों हाथ लेते थे अपने भी पराये भी
बचपन यार अच्छा था हँसता मुस्कराता था

बारीकी जमाने की, समझने में उम्र गुज़री
भोले भाले चेहरे में सयानापन समाता था

मिलते हाथ हैं लेकिन दिल मिलते नहीं यारों
मिलाकर हाथ, पीछे से मुझको मार जाता था

सुना है आजकल कि बह नियमों को बनाता है
बचपन में गुरूजी से जो अक्सर मार खाता था

उधर माँ बाप तन्हा थे इधर बेटा अकेला था
पैसे की ललक देखो दिन कैसे दिखाता था

जिसे देखे हुआ अर्सा , उसका हाल जब पूछा
बाकी ठीक है कहकर वह ताना मार जाता था

मदन मोहन सक्सेना



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
July 21, 2016

जय श्री राम मदन मोहनजी आपने कविता से बचपन की याद दिला दी कितनी अच्छी बेफिक्री की जिन्दगी होती थे खेलने में मज़ा आता तो दांत भी खानी पड़ती थी उन दिनों का तो कोइ जवाब नहीं सुन्दर कविता के लिए आभार आज कल बड़े होने पर यदि दो तीन से भी दिल मिल जाए तो बहुत भाग्यशाली.भौतिकता ने मानवता नष्ट कर दी.


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