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ग़ज़ल (मौत के साये में जीती चार पल की जिन्दगी)

Posted On 26 Jul, 2016 कविता में

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ग़ज़ल (मौत के साये में जीती चार पल की जिन्दगी)

आगमन नए दौर का आप जिसको कह रहे
वो सेक्स की रंगीनियों की पैर में जंजीर है

सुन चुके हैं बहुत किस्से वीरता पुरुषार्थ के
हर रोज फिर किसी द्रौपदी का खिंच रहा क्यों चीर है

खून से खेली है होली आज के इस दौर में
कह रहे सब आज ये नहीं मिल रहा अब नीर है

मौत के साये में जीती चार पल की जिन्दगी
ये ब्यथा अपनी नहीं हर एक की ये पीर है

आज के हालत में किस किस से हम बचकर चले
प्रश्न लगता है सरल पर ये बहुत गंभीर है

चंद रुपयों की बदौलत बेचकर हर चीज को
आज सब आबाज देते कि बेचना जमीर है

ग़ज़ल (मौत के साये में जीती चार पल की जिन्दगी)
मदन मोहन सक्सेना



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

achyutamkeshvam के द्वारा
July 31, 2016

शिक्षाप्रद ,मार्मिक ,उम्दा गजल

ashasahay के द्वारा
July 30, 2016

यह गजल अपने शीर्षकसे ही आधुनिक जीवन की विद्रूपताओं को इंगित कर रहा है। सार्थक रचना बधाई।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 28, 2016

चंद शब्दों में आपने बहुत बड़ी बात कह दी आदरणीय मदन जी ,बहुत अर्थपूर्ण ,उत्कृष्ट रचना .

sadguruji के द्वारा
July 28, 2016

आदरणीय मदन मोहन सक्सेना जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! बहुत अच्छी और विचारणीय गजल आपने प्रस्तुत की है ! सादर आभार !


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