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आज हम फिर बँट गए ज्यों गड्डियां हो तास की

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नरक की अंतिम जमीं तक गिर चुके हैं आज जो
नापने को कह रहे , हमसे बह दूरियाँ आकाश की

आज हम महफूज है क्यों दुश्मनों के बीच में
आती नहीं है रास अब दोस्ती बहुत ज्यादा पास की

बँट गयी सारी जमी ,फिर बँट गया ये आसमान
आज हम फिर बँट गए ज्यों गड्डियां हो तास की

हर जगह महफ़िल सजी पर दर्द भी मिल जायेगा
अब हर कोई कहने लगा है आरजू बनवास की

मौत के साये में जीती चार पल की जिंदगी
क्या मदन ये सारी दुनिया, है बिरोधाभास की

आज हम फिर बँट गए ज्यों गड्डियां हो तास की

मदन मोहन सक्सेना



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
August 2, 2016

श्री सक्सेना जी का दार्शनिक अंदाज एन पंक्तियों में देखने को मिलता है मौत के साये में जीती चार पल की जिंदगी क्या मदन ये सारी दुनिया, है बिरोधाभास की अति सुंदर


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