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कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है

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अँधेरे में रहा करता है साया साथ अपने पर
बिना जोखिम उजाले में है रह पाना बहुत मुश्किल

ख्वाबों और यादों की गली में उम्र गुजारी है
समय के साथ दुनिया में है रह पाना बहुत मुश्किल

कहने को तो कह लेते है अपनी बात सबसे हम
जुबां से दिल की बातो को है कह पाना बहुत मुश्किल

ज़माने से मिली ठोकर तो अपना हौसला बढता
अपनों से मिली ठोकर तो सह पाना बहुत मुश्किल

कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है
क्या खोया और क्या पाया कह पाना बहुत मुश्किल

कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है

मदन मोहन सक्सेना



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
August 4, 2016

जय श्री राम मदन मोहनजी आपने कविता के माध्यम से बहुत बढ़िया सन्देश दिया आक परिवारों में जो कडूहात है उसके पीछे भौतिवादी संस्कृत बहुत ज़िम्मेदार हा परिवार का जो प्यार का रिश्ता था वो ख़तम हो गया सुन्दर के लिए आभार


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