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परम्पराओं का पालन या अँध बिश्बास का खेल (करबा चौथ )

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करवाचौथ के दिन
भारतबर्ष में सुहागिनें
अपने पति की लम्बी उम्र के लिए
चाँद दिखने तक निर्जला उपबास रखती है .
पति पत्नी का रिश्ता समस्त
इस धरती पर सबसे जरुरी और पवित्र रिश्ता है
आज के इस दौर में जब सब लोग
एक दुसरे की जान लेने पर तुलें हुयें हों
तो आजकल पत्नी का पति के लिए उपवास रखना
किसी अजूबे से कम नहीं हैं।
कहाबत है कि करवा चौथ का व्रत रखने से
पति की आयु बढती है और प्यार भी
तो क्या जिनके खानदान में ये परंपरा है
क्या वहां कोई विधवा नहीं होती
और वहां कभी कोई तलाक नहीं हुआ
अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्यूं ये दिखावा
ऐसें भी दम्पति हैं सारे साल लड़ते झगड़ते है
और फिर ये दिखावा करते है
क्या जो महिलाये ये व्रत नहीं रखती
वो अपने पति से प्यार नहीं करती
क्या उनके मन में
अपने पति की उम्र की लम्बी कामना नहीं होती
क्या वे विधवा हो जाती है
नहीं ऐसा कुछ नहीं होता
हम सब ये सब जानते हैं
फिर भी ये परंपरा निभाते चले जाते है
ये अंधविश्वास नहीं तो और क्या है
आज जरुरत है पुराने अंधविश्वास को छोड़कर
नयी मान्यताओ को लेकर आगे बढना
जिसका कोई ठोस मकसद हो
वेसे भी क्या एक दिन ही काफी है
पति के लम्बी उम्र की कामना के लिए
बाकी के दिन नहीं
अगर हर रोज ये कामना करनी हैं
फिर ये करवा चौथ क्यों ?
आज के समय में
जरुरत है कि
नयी परम्पराओं को जन्म देकर
आपसी रिश्ता
कैसे मजबूत कर सकें
परस्पर मिलकर खोज करने की।
karva-chauth

मेरी पत्नी को समर्पित एक कबिता :

*******************************************************

अर्पण आज तुमको हैं जीवन भर की सब खुशियाँ
पल भर भी न तुम हमसे जीवन में जुदा होना
रहना तुम सदा मेरे दिल में दिल में ही खुदा बनकर
ना हमसे दूर जाना तुम और ना हमसे खफा होना

अपनी तो तमन्ना है सदा हर पल ही मुस्काओ
सदा तुम पास हो मेरे ,ना हमसे दूर हो पाओ
तुम्हारे साथ जीना है तुम्हारें साथ मरना है
तुम्हारा साथ काफी हैं बाकी फिर क्या करना है

अनोखा प्यार का बंधन इसे तुम तोड़ ना देना
पराया जान हमको अकेला छोड़ ना देना
रहकर दूर तुमसे हम जियें तो बह सजा होगी
ना पायें गर तुम्हें दिल में तो ये मेरी खता होगी

परम्पराओं का पालन या अँध बिश्बास का खेल
(करबा चौथ )

मदन मोहन सक्सेना

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
October 20, 2016

सर हमारा घर में रोड पर है सबसे पहले एक पेड़ है उसके पीछे चाँद दिखाई देता है अनेक जोड़े चाँद को जल चढाने आते हैं हर वर्ष सुखद नजारे देखने को मिलते है एक ही लिख रही हूँ सजी धजी पत्नी उसी तरह विवाह की शेरवानी में पति उनके दो बच्चे पहले उचक- उचक कर चाँद ढूंढते हैं जब निकल आता है पति के हाथ में थाली पत्नी फ्रूटी लेकर आई दोनों ने मिल कर चाँद की पूजा की शायद दोनों ने एक दूसरे के लिए व्रत रखा फिर एक दूसरे को फ्रूटी पिलाई दोनों बच्चे तालियां बजा रहे थे उनकी आँखों से एक दूसरे के लिए ऐसे प्यार टपक रहा था यह हम बुद्धिजीवियों की समझ में नहीं आएगा यह पति के उम्र बढ़ने की बात नहीं है | इमोशनल वेल्यू है मेरे बच्चे भी आसमान पर चाँद ढूंढते थे अब दो बाहर हैं उनका फोन आता है मम्मा शायद चाँद निकल आया होगा

rameshagarwal के द्वारा
October 18, 2016

जय श्री राम मदन मोहन जी हमारे ऋषि मुनिओ ने बहुत सोच समझ कर बहुत से त्योहारों और पर्वो को भारतीय संस्कृति में संयोजित किया वे समाज और परिवार में भाई चारा , प्यार और आत्मविश्वास के लिए किये गए थे.ये परम्पराए सदीओ से चल रही और विश्वास और आस्था पर चल रहे.हर एक की अलग अलग मान्यता है और चलती रहेगी.थोड़े बहुत तो उतार चड़ाव होते रहते.अच्छे पतिओ को या तो खुद व्रत करना चाइये या ऐसा कार्य जिससे बेटर हाफ को लालच न आये यानि उसके सामने खाना न खाए.आधुनिकता और पच्छिम सभ्यता के प्रभाव में कुछ तो फर्क पड़ा ही है सुन्दर कविता के लिए आभार.


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